दहेज प्रथा पर निबंध | Dowry System Essay in Hindi

दहेज प्रथा पर हिन्दी निबंध | Dowry Essay in Hindi 

दहेज प्रथा केक सामाजिक बुराई है जो समय के साथ-साथ बढ़ी है। इस बुराई के बारे में जागरूकता फैलाने के लिए हम लेकर आए हैं दहेज प्रथा पर हिन्दी निबंध। 

दहेज प्रथा पर निबंध (150 शब्द)

दहेज का अर्थ है विवाह के समय लड़की के परिवार की तरफ से लड़के के परिवार को धन-संपत्ति आदि का देना। वास्तव में धन-संपत्ति की मांग लड़के के परिवार वाले सामने से करते हैं और लड़की के घर वालों को उनकी मांग के अनुसार धन-संपत्ति देनी पड़ती है।

दहेज प्रथा एक ऐसी कुरिवाज है जो सदियों से भारत जैसे देश में अपनी पकड़ बनाए हुई है। दहेज प्रथा के कारण ना जाने कितनी महिलाओं का शारीरिक व मानसिक शोषण होता है, कई बार तो दहेज के कारण नव वधू की हत्या भी कर दी जाती है।

भारत में दहेज प्रथा को रोकने के लिए कानून भी बनाया गया है लेकिन दुख की बात यह है की कानून बनने के बाद भी दहेज प्रथा की जड़ें और मजबूत हो गईं है।

दहेज जैसी कुप्रथा को रोकने के लिए समाज के लोगों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है, तभी हम इस कुरीति को खतम कर सकते हैं।

दहेज प्रथा पर निबंध (250 शब्द)

दहेज का अर्थ है जो सम्पत्ति, विवाह के समय वधू के परिवार की तरफ़ से वर को दी जाती है। भारत और दुनिया के अन्य भागों में दहेज प्रथा का लंबा इतिहास है। भारत में इसे दहेज के नाम से जाना जाता है।

बहुत पहले विवाह के समय वधू का परिवार वर को इसलिए धन-संपत्ति देता था क्यूंकी उस समय लड़की को अपने पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था, इसलिए विवाह के समय ही एक पिता अपनी बेटी को उसका अधिकार दे देता था। लेकिन फिर धीरे-धीरे यह एक कुरिवाज में बादल गयी और अब तो वर पक्ष के लोग सामने से दहेज मांगते हैं और मजबूर होकर कन्या पक्ष को दहेज देना पड़ता है।

दहेज प्रथा के कारण ना जाने कितनी महिलाओं को आत्म हत्या करने के लिए मजबूर होना पड़ता है, माँ-बाप गरीब होने की वजह से अपनी बेटी की शादी नहीं कर पाते और ना जाने कितनी शादी-शुदा ज़िंदगी दहेज के कारण तबाह हो जाती हैं। 

भारत जैसे देश में दहेज प्रथा की जड़ें बहुत मजबूत हैं। यहाँ तक की शिक्षित समाज भी इस कुप्रथा से अछूता नहीं है। हमारे समाज में दहेज प्रथा के बारे में सभी लोगों ने एक ऐसी सोच बना रखी है जिसमे दहेज देना कन्या पक्ष के लिए जरूरी बना दिया गया है। यदि कन्या पक्ष दहेज देने के इच्छुक नहीं है तो ऐसी परिस्थिति में लड़की के विवाह में भी अड़चनें आ सकतीं है।

ऐसा नहीं की दहेज प्रथा को रोकने के लिए कोई कानून नहीं है, कानून तो है लेकिन उसका अनुसरण कोई नहीं करना चाहता क्यूंकी जिस घर में बेटी है तो वहाँ बेटा भी है। मतलब की एक हाथ लड़की की शादी में दहेज देना पड़ता है तो दूसरे हाथ दहेज ले भी लिया जाता है। दहेज प्रथा को रोकने के लिए समाज को अपनी सोच बदलने की जरूरत है।

दहेज प्रथा पर निबंध (400 शब्द)

दहेज अर्थात विवाह के समय दुल्हन के परिवार द्वारा दूल्हे को धन-संपत्ति आदि का देना। पहले दहेज एक पिता अपनी बेटी को खुशी से देता था लेकिन आज वो एक सामाजिक बुराई बन गयी है और हमारे समाज में दहेज प्रथा की जड़ें बहुत मजबूत हो चुकीं हैं। 

दहेज जैसी कुप्रथा की वजह से बेटियों को पेट में ही मार दिया जाता है क्यूंकी बेटी का जन्म हुआ तो उसकी शादी में ढेर सारा धन देना पड़ेगा। समाज में लड़कियों के साथ भेदभाव किया जाता है और उन्हें बोझ की तरह समझा जाता है। भारत के कई राज्यों में लड़कों कीअपेक्षा लड़कियों की संख्या में कमी आई है।

दहेज प्रथा की वजह से महिलाओं के खिलाफ अत्याचार बढ़ा है। अकसर उन्हें लड़के के घर वालों द्वारा दहेज के लिए शारीरिक व मानसिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है और कई बार उन्हें आत्महत्या करने के लिए भी मजबूर कर दिया जाता है।

दहेज जैसी कुप्रथा को दूर करने के लिए भारत देश में कानून बनाया गया है जिसके तहत दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध है। इसके बावजूद भी दहेज प्रथा पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

दहेज प्रथा के कई कारण है। समाज में पहले से ही इसकी रिवाज बना दी गयी है जिसे समाज के लोग एक परंपरा के रूप में मानते हैं। लड़के वाले दहेज लेने से समाज में उनका कद बढ़ाने की सोचते हैं। लालच इसकी सबसे बड़ी वजह है जिसमे वर पक्ष बड़ी बेशर्मी से ढेर सारा रुपया-पैसा कन्या पक्ष से मांगता है। हमारी सामाजिक संरचना इस प्रकार की है जिसमे महिला को पुरुषों से कम समझा जाता है और उन्हें सिर्फ एक वस्तु माना जाता है। यही सोच समाज में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचार की बड़ी वजह है।

ऐसा नहीं है की कम पढे-लिखे लोग ही दहेज की मांग करते हैं बल्कि उसके विपरीत अधिक पढे-लिखे लोग भी दहेज की प्रथा को सही मानते हैं और विवाह में वो भी खूब दहेज की मांग करते हैं।

दहेज प्रथा को यदि हमें जड़ से खतम करना है तो सबसे पहले कड़े कानून बनाकर उनका सख्ती से अमल कराना चाहिए। समाज में लोगों को अपनी सोच बदलने की आवश्यकता है की बेटा हो या बेटी सभी समान है, बेटी हर काम कर सकती है और वो बेटों से कम नहीं है। लड़कियों को शिक्षित करना भी जरूरी है ताकि वो आगे चलकर आत्मनिर्भर बन सकें।

दहेज प्रथा को खतम करना है तो सबसे पहले महिलाओं को जागरूक बनना पड़ेगा और पुरुष प्रधान समाज को आईना दिखाने की जरूरत है। जो सोच सदियों से चली आ रही है उसमें बदलाव की जरूरत है।

दहेज प्रथा पर विस्तृत निबंध (1200 शब्द)

प्रस्तावना

दहेज लेना और देना दोनों ही कानूनन अपराध क्यूँ ना हो लेकिन इसकी जड़ें अब इतनी मजबूत हो चुंकी हैं की 21वीं सदी में आने के बाद भी यह खतम नहीं हुई है। समय के साथ-साथ इस कुप्रथा का चलन और ज्यादा बढ़ा है। भारत जैसे देश में दहेज प्रथा अब भी मौजूद है।

दहेज का अर्थ

दहेज का मतलब है विवाह के समय कन्या के परिवार द्वारा वर को दी जाने वाली धन-संपत्ति। विवाह के समय लड़की के घर वाले लड़के को ढेर सारा पैसा, माल सामान आदि देते हैं जिसे दहेज के रूप में जाना जाता है। दहेज तब तक तो ठीक है जब लड़की का पिता अपनी खुशी से दे रहा हो लेकिन जब लड़के के घर वाले अधिक धन-संपत्ति मांग कर लें जिसे देने में कन्या का परिवार सक्षम ना हो तब दहेज का हमें भयानक चेहरा देखने को मिलता है।

विवाह के दौरान लड़के के घर वाले कई बार ऐसी मांग कर देते हैं जिसे पूरा करने के लिए लड़की के घर वाले सक्षम नहीं होते, ऐसी हालत में कई बार शादी टूटने तक की नोबत आ जाती है। इसी को दहेज प्रथा कहते हैं।

भारत में दहेज प्रथा

भारत जैसे देश में दहेज प्रथा ने सदियों से अपनी जड़ें मजबूत कर रखीं हैं। आज भी आधुनिक समाज में दहेज लिया जाता है और समय के साथ-साथ यह कुरिवाज बढ़ी है।

पहले के समय में जब लड़की को पिता की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं था तब एक पिता अपनी बेटी को उसके विवाह के समय ही धन-संपत्ति दे देता था। उस समय इसे एक अच्छी रिवाज माना जाता था। लेकिन धीरे-धीरे इस रिवाज ने दहेज जैसी कुप्रथा को जन्म दिया।

अब ऐसा समय आया है की लड़के के घर वाले सामने से दहेज की मांग करते हैं भले ही लड़की का परिवार देने में सक्षम हो या ना हो। शादी तय करने से पहले ही दहेज की बात तय हो जाती है। शादी तभी की जाती है जब कन्या का पक्ष मांगा गया दहेज लड़के के घर वालों को दे देता है।

हमारा पढ़ा-लिखा समाज भी इससे अछूता नहीं है, बल्कि पढे लिखे लोग ही सबसे ज्यादा दहेज विवाह में लेते हैं।

दहेज प्रथा के कारण

दहेज जैसी कुप्रथा आज भी हमारे समाज में मौजूद है जिसके कई कारण है।

1. लालच: दहेज की मांग अक्सर लालच के वशीभूत होकर की जाती है। लड़का पढ़ा-लिखा है, अच्छी नौकरी करता है, घर अच्छा है आदि कारण देकर लड़की के घर वालों से दहेज की मांग की जाती है। बड़ी बेशर्मी के साथ लड़के के घर वाले अपनी मांगों को रखते हैं।

2. सामाजिक संरचना: दहेज प्रथा काफी हद तक भारतीय समाज की पुरुष प्रधान सोच का नतीजा है जहां पुरुषों को शारीरिक और मानसिक क्षमताओं के पहलुओं में महिलाओं से बेहतर माना जाता है। ऐसी सामाजिक संरचना की पृष्ठभूमि के साथ, महिलाओं को अक्सर दूसरी श्रेणी का नागरिक माना जाता है जो केवल घरेलू भूमिकाओं को संभालने के लिए सही होती हैं। इस तरह की धारणाएँ अक्सर उन्हें पहले पिता द्वारा और फिर पति द्वारा आर्थिक दृष्टि से बोझ समझा जाता हैं। इस भावना को दहेज प्रथा द्वारा और अधिक जटिल बना दिया गया है।

3. महिलाओं की सामाजिक स्थिति – भारतीय समाज में महिलाओं की हीन सामाजिक स्थिति इतनी गहरी है, कि उन्हें मात्र वस्तुओं के रूप में स्वीकार किया जाता है, न केवल परिवार द्वारा, बल्कि महिलाओं द्वारा भी खुद को। जब विवाह को महिलाओं के लिए अंतिम उपलब्धि के रूप में देखा जाता है, तो दहेज जैसी कुप्रथा समाज में जड़ पकड़ लेती है।

4. निरक्षरता – शिक्षा का अभाव दहेज प्रथा की व्यापकता का एक अन्य कारण है। बड़ी संख्या में महिलाओं को जानबूझकर स्कूलों से दूर कर दिया जाता है। आज भी ऐसी सोच के लोग मौजूद हैं जो लड़की के अधिक पढ़-लिख जाने के खिलाफ होते हैं।

5. दिखावा करने का आग्रह – दहेज अक्सर हमारे देश में सामाजिक कद दिखाने के लिए एक साधन है। समाज में किसी के मूल्य को अक्सर इस बात से मापा जाता है कि वो बेटी की शादी में कितना खर्च कर रहा है या कोई कितना धन देता है। यह नजरिया दहेज की मांग के प्रचलन को काफी हद तक सही ठहराता है। बदले में लड़के का परिवार अपनी नई दुल्हन की दहेज की राशि के आधार पर अपना सामाजिक कद बढ़ाने के बारे में सोचता है।

दहेज प्रथा के दुष्प्रभाव

कन्या भ्रूण हत्या – गर्भ में ही बेटी को मार दिया जाता है जिसे कन्या भ्रूण हत्या कहते हैं। इसका बड़ा कारण कहीं ना कहीं दहेज प्रथा ही है। बेटी हुई तो उसकी शादी कैसे होगी, दहेज कैसे देंगे यही सोच रखकर माँ-बाप गर्भ में ही बेटियों को मार देते हैं। कन्या भ्रूण हत्या के कारण समाज में लड़कियों की संख्या में भी कमी दर्ज की जाती है।

लड़कियों के प्रति भेदभाव – लड़की बोझ होती है – समाज की यह सोच भी दहेज प्रथा के कारण है। लड़की को पढ़ाओ-लिखाओ उसका खर्च और उसके बाद उसकी शादी में ढेर सारा खर्च ऐसा सोच कर बचपन से ही लड़कों की तुलना में लड़की के साथ भेद भाव किया जाता है।

महिलाओं का शारीरिक और मानसिक शोषण – दहेज प्रथा के कारण हर साल हजारों शादी-शुदा महिलाएं आत्महत्या कर लेतीं हैं या लड़के के घर वालों द्वारा उन्हें मार दिया जाता है। हर रोज महिलाएं शारीरिक और मानसिक प्रताड़नाएं सहन करतीं हैं।

आर्थिक बोझ – लड़की की शादी में ढेर सारा दहेज देना पड़ता है और शादी का खर्च अलग से उठाना पड़ता है, इस वजह से लड़की के घर वालों को अक्सर आर्थिक बदहाली का सामना करना पड़ता है। कई बार तो उन्हें उधार लेकर दहेज की मांग पूरी करनी पड़ती है।

दहेज प्रथा रोकने के उपाय 

दहेज जैसी कुप्रथा को दूर करना बहुत कठिन है क्यूंकी यह समाज के लोगों की सोच में इस तरह अपनी पकड़ मजबूत कर चुकी है जिसे बदलना मुश्किल है। फिर भी इसे रोकने के लिए हम निम्न कदम उठा सकते हैं।

कडा कानून – दहेज प्रथा और उससे उपजी महिलाओं के खिलाफ अन्याय को रोकने के लिए कई कानून बनाए गए हैं। दहेज निषेध अधिनियम 20 मई, 1961 को पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य समाज से इस बुरी प्रथा को समाप्त करना था। यह कानून न केवल दहेज को गैरकानूनी मानता है, बल्कि इसे देने या मांग करने पर दंड भी देता है।

सामाजिक जागरूकता – दहेज प्रथा की बुराइयों के खिलाफ एक व्यापक जागरूकता पैदा करना ही इस प्रथा को खत्म करने की दिशा में महत्वपूर्ण पहला कदम है। समाज के सभी तबके तक पहुंचने के लिए और दहेज के खिलाफ कानूनी प्रावधानों के बारे में ज्ञान फैलाने के लिए सामाजिक जागरूकता जरूरी है।

महिलाओं की शिक्षा और आत्म-निर्भरता – जीवन में केवल अपने व्यवसाय को खोजने के लिए शिक्षा की आवश्यकता नहीं है। दहेज जैसी व्यापक सामाजिक बुराइयों से लड़ने के लिए लड़कियों को शिक्षित करने पर जोर देना महत्वपूर्ण है। उनके अधिकारों का ज्ञान ही उन्हें दहेज प्रथा और उनके साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ बोलने में सक्षम करेगा। वे आत्म-निर्भरता के लिए भी प्रयास करने में सक्षम होंगी और शादी को उनके एकमात्र उद्देश्य के रूप में नहीं समझेंगी।

मानसिकता में बदलाव – दहेज जैसी अपराधिक रिवाज के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए लोगों को अपनी मानसिकता बदलने की आवश्यकता है। उन्हें इस तथ्य को महसूस करने की आवश्यकता है कि आज के समाज में महिलाएं कुछ भी करने में पूरी तरह से सक्षम हैं जो पुरुष कर सकते हैं। महिलाओं को खुद इस विश्वास से बाहर आने की जरूरत है कि वे पुरुषों से कम हैं।

उपसंहार

दहेज जैसी कुप्रथा को रोकना है तो हमें हमारी सोच बदलने की जरूरत है। स्त्री का सम्मान हमें करना चाहिए और यह सोच अपने मन से निकाल देनी चाहिए की दहेज से हमारा गुजारा हो जाएगा या हमारा नाम ऊंचा हो जाएगा।

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